आग की आंधी कछार में उठी चिंगारी ने निगल ली खेत खलिहान, किसान खड़े रह गए बेबस
आग की आंधी कछार में उठी चिंगारी ने निगल ली खेत खलिहान, किसान खड़े रह गए बेबस
मेहदावल/संतकबीरनगर। मंगलवार का दिन पूर्वी कछार के किसानों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। गेहूं के डंठल से उठी एक छोटी-सी चिंगारी ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया और पछुआ हवा के सहारे गांव दर गांव तबाही की इबारत लिखती चली गई। कुछ ही घंटों में बलौहा, भरथुआ, जोरवा और नौगो के खेत-खलिहान धुएं और राख में तब्दील हो गए। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। जहां कल तक सुनहरी फसल और भूसे के ढेर थे, वहां अब सिर्फ जली हुई जमीन और बिखरी उम्मीदें बची हैं। सबसे पहले बलौहा गांव इसकी चपेट में आया। यहां कई परिवारों की गृहस्थी उजड़ गई। घरों में रखा अनाज, भूसा, साइकिल और नकदी तक आग की भेंट चढ़ गई। लोगों ने बाल्टियों और ट्यूबवेल के सहारे आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन तेज हवाओं ने हर प्रयास को नाकाम कर दिया। भरथुआ में हालात और भयावह रहे। कई किसानों का महीनों का जुटाया भूसा पलभर में जलकर खत्म हो गया। कुछ परिवारों के सिर से छत तक छिन गई, जिससे वे खुले आसमान के नीचे आने को मजबूर हो गए। जोरवा और नौगो में भी आग ने कोई रहम नहीं दिखाया। किसानों का कहना है कि साल भर की मेहनत, अनाज और पशुओं का चारा सब कुछ जल गया। अब सबसे बड़ी चिंता परिवार के भरण-पोषण और मवेशियों के लिए चारे की है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग की ऊंची-ऊंची लपटें और धुएं का गुबार इतना भयानक था कि कोई भी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। गांव में आग बुझाने के पर्याप्त साधन न होने के कारण लोग सिर्फ अपनी आंखों के सामने सब कुछ जलता हुआ देखते रह गए। घटना के बाद पीड़ित किसान गहरे सदमे में हैं। उनका कहना है कि अगर जल्द सहायता नहीं मिली तो उनके सामने जीवन यापन का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि तुरंत नुकसान का आकलन कराकर उचित मुआवजा दिया जाए, ताकि वे फिर से अपने जीवन को पटरी पर ला सकें। इस अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ग्रामीण इलाकों में आपदा से निपटने के इंतजाम कब मजबूत होंगे, ताकि किसी और किसान की मेहनत यूं राख में न बदले।
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